बाहर भीतर एकै जानौ, यह गुरु ज्ञान बताई।
जन नानक बिना आपा चीन्हे, मिटै न भ्रम की काई।।
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जो कुछ भी वाहरी जगत में देखते हैं, जो आनंद हमें भोतिक जगत में प्राप्त होता है उसका वास्तविक रूप तो हमारे ही आंतरिक जगत में छिपा हुआ है | परन्तु यह हमें गुरु से ज्ञान प्राप्ति के पछ्चात ही पता चलता है | जब तक हम स्वयं को नहीं पहचानते के हम कौन हैं ? हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है ? तब तक हमारे संशयों का नाश नहीं हो सकता | परन्तु यह सब गुरु के बिना संभव नहीं |
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