"बुद्धि की चतुराई प्रेम में बाधक है।"सूरदास के पद के आधार पर इस कथन की विवेचना कीजिए।
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बुद्धि की चतुराई प्रेम में बाधक है।सूरदास के पद के आधार पर इस कथन की विवेचन इस तरह की गई हैं -
- सूरदास के पद में उन्होंने गोपियों का अत्यंत प्रेम श्री कृष्ण के ओर बताया हैं।
- भ्रमरगीत के प्रस्तुत पदो मे सूरदास ने बुद्धि की चतुराई को गूपियों के प्रेम का तर्क देकर बताया हैं ।
- गोपियों का कहना हैं की प्रेम अनुभूति का विषय हैं , इसमें सरलता , निश्छलता , और संपूर्ण लगन की ज़रूरत होती हैं।
- तर्क-शक्ति के आधार पर प्रेम नहीं किया जा सकता हैं , इसलिए वह कृष्ण से उनकी मन की शक्ति और मन को वापस देने को कहती हैं ।
- अतः बुद्धि की चतुराई प्रेम में बाधक है।
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