भोलाराम का जीव शासकीय व्यवस्था पर प्रहार है इस कथन की व्याख्या कीजिए
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‘भोलाराम का जीव’ हमारी शासन व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार सरकारी भ्रष्टाचार पर प्रहार करता है। सरकारी दफ्तरों में कोई भी कार्य रिश्वत दिए बिना संपन्न नहीं होता। बाबू लोगों को जब तक रिश्वत नहीं दो, वह फाइल को लटकाए रहते हैं और आम आदमी चक्कर लगा लगा कर थक जाता है, लेकिन उसकी फाइल आगे नहीं बढ़ती।
भोलाराम के जीव कहानी में लेखक ने इसी सामाजिक व्यवस्था पर तीखा व्यंग और गहरा कटाक्ष किया है। भोलाराम जैसा आम आदमी अपनी पेंशन के लिए भटक-भटक कर थक गया और अंत में अपने जान भी गवां बैठा, लेकिन उसका कार्य नहीं हुआ। यह कहानी हमारी सामाजिक विसंगति और राजनीतिक भ्रष्टाचार को प्रकट करती है, जिसमें एक आम आदमी की जान चली जाती, लेकिन बाबू लोगों पर कोई असर नहीं, उन्हें अपनी जेबे भरने से मतलब होता है।
नौकरशाही में बढ़ता भ्रष्टाचार आम आदमी को किस तरह के शिकंजे में जकड़ कर उन्हें असहाय और दयनीय बना देता है, लेखक ने इस कहानी के माध्यम से यह दर्शाने का प्रयत्न किया है।
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