भाव विस्तार गर-
१. एकता नै बल हो।
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संसार में रहते हुए कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितना ही बलवान धनवान या बुद्धिमान हो अकेले ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता है। वह दूसरों के सहयोग से ही अपनी आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है। इस प्रकार मिलजुल कर कार्य करने की शक्ति को एकता या संगठन कहते हैं।
एकता ही सब शक्तियों का मूल है। किसी भी परिवार, समाज और राष्ट्र की उन्नति, एकता पर निर्भर करती है। संपूर्ण सृष्टि का निर्माण निर्माण भी पांच तत्वों से हुआ है। एकता में बड़ी शक्ति होती है, इसी से संसार में सुख-समृद्धि तथा सफलता की प्राप्ति होती है। अकेले धागे को लेकर कोई भी तोड़ सकता है, परंतु अनेक भागों के मेल से बनी रस्सी बड़े-बड़े हाथियों को भी बांध देती है। अकेली पानी की बूंद का कोई महत्व नहीं, परंतु जब यह मिलकर नदी का रूप धारण कर लेती है तो अपने प्रवाह में आने वाले बड़े से बड़े पेड़ों और शिलाओं को भी बहा ले जाती है।
जो देश, जातियां और कुटुंब जितने अधिक संगठित रहें हैं, उनका उतना ही अधिक बोलबाला रहा है। भारत की गुलामी का मूल कारण भी हमारी एकता की कमी थी। अंग्रेजों ने हममें फूट डालकर हमें गुलाम बना दिया। जब हम एक होकर खड़े हुए हैं, तो हमारा देश स्वतंत्र हो गया। वर्तमान युग में तो संगठन की और भी अधिक आवश्यकता है। इसी के बल पर मजदूर वर्ग अपने हितों की रक्षा कर सकते हैं।
आज के संघर्षशील युग में जो जितने अधिक संगठित होंगे, वह उतने अधिक सुखी और समृद्धशाली होंगे। देश, जाति, संस्था अथवा समाज चाहे वह बड़ा हो या छोटा हो बिना एकता के जीवित नहीं रह सकता। आज हमारे देश के सामने अनेक शत्रु राष्ट्रों की बड़ी चुनौती है। कुछ आंतरिक शत्रु भी इसे नष्ट करने पर तुले हुए हैं। हम इन शत्रुओं का सामना एकता द्वारा ही कर सकते हैं। अतः हमें पारिवारिक हित के लिए समाज और देश के हित के लिए भेदभाव को भुलाकर एकता से रहना चाहिए।