चाटुकार मानव धर्म के लिए अभिशाप है निबंध 370-450 words fast
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भारतीय ऋषिमुनियों और चिंतकों के मतानुसार सृष्टि में मानव से अधिक श्रेष्ठ और कोई नहीं। मनुष्य जीवन सृष्टि की सर्वोपरि कलाकृति है। ऐसी कायिक और मानसिक सर्वागपूर्ण रचना और किसी प्राणी की नहीं है। जब एक बार कोई मनुष्य योनि में आ जाता है तो मानवता उससे स्वयं जुड़ जाती है। इसका सर्वदा ध्यान रखना, उससे विलग न होना ही मानव जीवन की सार्थकता है। मानव की प्रतिष्ठा में ही धर्म की प्रतिष्ठा है। मानव को संतृप्त, कुंठित एवं प्रताड़ित करके कोई भी धर्म सामान्य नहीं हो सकता। इसीलिए संस्कृति राष्ट्रीयता के जनक स्वामी विवेकानंद कहा करते थे, 'सच्ची ईशोपासना यह है कि हम अपने मानव-बंधुओं की सेवा में अपने आपको लगा दें।' सदाचार और मानवता की बलिवेदी पर धर्म का प्रचार-प्रसार करना अनैतिक एवं अमानवीय है। जो रोटी को तरस रहे है, उनके हाथों में दर्शन और धर्म ग्रंथ रखना उनका मजाक उड़ाना है। मानवता का विस्तार किसी विशेष परिधि तक सीमित न होकर विश्वव्यापी है। अत: इसका विकास चाहे किसी भूखंड पर हो, किंतु विश्वभर की मानव जाति एक ही है। समानता की इसी भावना को आत्मसात करते हुए हमारे मनीषियों ने कहा-यह सब जो कुछ पृथ्वी पर चराचर वस्तु है, ईश्वर से आच्छादित है।
मानव धर्म वह व्यवहार है जो मानव जगत में परस्पर प्रेम, सहानुभूति, एक दूसरे का सम्मान करना आदि सिखाकर हमें श्रेष्ठ आदर्शो की ओर ले जाता है। मानव धर्म उस सर्वप्रिय, सर्वश्रेष्ठ और सर्वहितैषी स्वच्छ व्यवहार को माना गया है जिसका अनुसरण करने से सबको प्रसन्नता एवं शांति प्राप्त हो सके। धर्म वह मानवीय आचरण है जो अलौकिक कल्पना पर आधारित है और जिनका आचरण श्रेयस्कर माना जाता है। संसार के सभी धर्मो की मान्यता है कि विश्व एक नैतिक राज्य है और धर्म उस नैतिक राज्य का कानून है। दूसरों की भावनाओं को न समझना, उनके साथ अन्याय करना और अपनी जिद पर अड़े रहना धर्म नहीं है। एकता, सौमनस्य और सबका आदर ही धर्म का मार्ग है, साथ ही सच्ची मानवता का परिचय भी।
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Explanation:
धर्म शब्द का वास्तविक अर्थ है वे नियम जिन पर चलने से समाज में नैतिकता व मानवता बनी रहे। धर्म के मूल स्तंभ हैं- दान, दया, तप, सत्यता व शुचिता तथा शौच व क्षमा इत्यादि। धर्म के नियमों पर चलने के उपरांत मानव हृदय निर्मल हो जाता है तथा इस स्थिति में करुणा जन्म लेती है। करुणा के कारण दया व क्षमा का भाव जाग्रत होता है। इन दोनों गुणों के कारण मानव, मानव से प्रेम करने लगता है व दूसरों को दुख से निकालने की कोशिश करने लगता है। आज के समाज में चारों तरफ फैले हुए नैतिक पतन ने हमारे धर्म का असली अर्थ भुला दिया है। पहले समाज में अग्रणी लोगों में दया व दान की भावना थी। इस कारण उस समय शिक्षा व चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में ज्यादातर स्कूल, कॉलेज व चिकित्सालय दान पर आधारित संस्थाएं चलती थीं। उस समय इन संस्थानों में पैसा तथा रुतबा का कोई स्थान एक आम नागरिक को इनकी सुविधा प्राप्त करने में बीच में नहीं आता था, परंतु आज मानवता की सेवा के ये प्रमुख केंद्र दया, दान व करुणा की भावना से कोसों दूर चले गए हैं तथा आज इनकी मूलभूत सेवाओं में धन कमाने की भावना ने दान व दया को दूर कर दिया है। दया व क्षमा का वर्तमान समय में सर्वथा अभाव हो गया है। हमारे पौराणिक ग्रंथों में राक्षसों का वर्णन आया है। भगवान श्रीराम ने अरण्यकांड में राक्षसों की कुछ पहचान बताई है, जिनमें प्रमुख हैं लालच और हिंसा के साथ-साथ दूसरों के दुख में खुश होना, दूसरों की बुराइयों को 100 नेत्रों से देखना, दया व करुणा का सर्वथा अभाव इत्यादि। इन तमाम अवगुणों के कारण समाज में अव्यवस्था, हिंसा व घृणा फैलाने वाले कुछ लोग एक आम मानव को कष्ट पहुंचा रहे हैं, जैसा कि पौराणिक समय में राक्षस किया करते थे। आइए समाज में प्रेम, करुणा व दया को जीवन में प्रमुखता प्रदान करते हुए एक बार फिर प्रेम की गंगा बहाएं तथा मानव के प्रति सौहार्द्र बढ़ाएं।