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06)
कति 1 अ) गद्याश पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ पूर्ण कीजिए
'प्रभात का समय था, आसमान। से बरराती हुई प्रकाश की किरणें संसार पर नवीन जीवन की वर्षा
कर रही थी। बारह घंटों के लगातार संग्राम के बाद प्रकाश ने अधेरै पर विजय पाई थी। इस खुशी में
फल झूम रहे थे. पक्षी मीठे गीत गा रहे थे. पेड़ों की शाखाएँ खेलती थी और पत्ते तालियाँ बजाते थे। चारों
तरफ खुशियों झूमती थी। चारो तरफ गीत गूंजते थे। इतने में साधुओं की एक मंडली शहर के अंदर
दाखिल हुई। उनका खयाल था- मन बडा बंचल है। अगर इसे काम न हो, तो इधर-उधर भटकने लगता
और आप स्वागी को विनाश की खाई में गिराकर नष्ट कर डालता है। इसे भक्ति की जंजीरों से जकड
देना चाहिए। साधु गाते थे-
सुमर-सुमर भगवान को
मूरख गत खाली छोड़ इस मन को।
जब रासार को त्याग चुके थे उन्हें सुर-ताल की क्या परवाह थी। कोई उनके स्वर में गाता था
कोई गुह मे गुनगुनाता था। और लोग क्या कहते हैं. इन्हें इसकी जरा भी चिंता न थी। ये अपने राग में
मगन थे कि सिपाहियों ने आकर घेर लिया और हथकड़ियाँ लगाकर अकबर बादशाह के दरबार को ले
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चले।
यह वह समय था जब भारत में अकबर की तूती बोलती थी और उसके मशहूर रागी तानसेन ने
यह कानून बनवा दिया था कि जो आदमी रागविद्या में उसकी बराबरी न कर सके, वह आगरे की सीमा में
गीत न गाए और जो गाए उसे मौत की राजा दी जाए। बेचारे बनवासी साधुओं को पता नहीं था परंतु
अज्ञान भी अपराध है। मुकदमादरबार में पेश हुआ । तानसेन ने रागविद्या के कुछ प्रश्न किए । साधु उत्तर
में मुंह ताकने लगे । अकबर के होंठ हिले और सभी साधु तानसेन की दया पर छोड़ दिए गए ।
दया निर्बल थी, वह इतना भार सहन न कर सकी। मृत्युदंड की आज्ञा हुई । केवल एक दस वर्ष
का बच्चा छोड़ा गया बच्चा है, इसका दोष नहीं । यदि है भी तो क्षमा के योग्य है।
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आगरा शहर का प्रभातकालीन वातावरण
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please answer me bhaiyo
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