प्रगति और विकास के बहाने मनुष्य ने इतनी बेदर्दी से वनों का विनाश किया है उतना ही udvignta से पश्चाताप कर रहा है इन पंक्तियों के आधार पर अपने विचार लिखिए plz tell me answer language Hindi plz send me fast answer
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इसके ठीक विपरीत दिशा में औद्योगिक क्रान्ति के बाद मानव-विश्व कैसे विकसित होता गया यह हमने इस निवेदन में देखा है। अपना प्राण देकर नहीं, अपने स्वार्थ के लिये सृष्टि के जीव-जन्तु, पशु, वृक्ष इनके प्राण लेकर हम अपना विकास चाहते हैं। इस सन्दर्भ में एक व्यंग चित्र अंग्रेजी पीरियोडिकल में आया था। एक ठिगना आदमी अपने हाथ के नीचे, बगल में एक प्रचण्ड वृक्ष को छिपाकर दौड़ रहा था।
किसी ने उससे पूछा- कहाँ भाग रहे हो? ठिगने आदमी ने दौड़ते हुए ही जवाब दिया। किसी सुरक्षित स्थान में इस वृक्ष को छिपाने के लिये दौड़ रहा हूँ, क्योंकि सीमेंट कंक्रीट का रास्ता मेरा पीछा कर रहा है। अपने देश में सभी बड़े शहरों में रास्ते चौड़े बनाने की मुहिम में दोनों तरफ के प्रचण्ड, छायादार वृक्षों को जड़ो सहित उखाड़ने का कार्य हो रहा है। यही विकास की छवि हमारे मन में निश्चित हो चुकी है।
लेकिन इस विनाशक, क्रूर विकास का नतीजा मनुष्य के लिये क्या हुआ है? मनुष्य सृष्टि से, मानव समाज से और स्वयं अपने से भी टूटकर अलग हो गया है। सबसे टूट जाने को मजबूर करने वाली सभ्यता और संस्कृति निरोग नहीं होती है। इस सभ्यता को शान्ति का और एकान्त का वातावरण सुहाता नहीं। वैर का और स्पर्धा का मानसशास्त्र भीड़ के मानसशास्त्र का ही एक हिस्सा बन जाता है।