Parivaar ke logon ke kis prakar ke vyavhar se aahat hokar harihar Kaka ko thakur Bari jaisi sanstha per rahana pada
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लेखक कहता है कि जब उसके पहले दोस्त हरिहर काका बने तो उसे ऐसा लगा जैसे हरिहर काका ने भी लेखक से दोस्ती करने के लिए अपनी इतनी लम्बी उम्र तक इन्तजार किया हो। लेखक की माँ ने लेखक को बताया था कि उससे पहले हरिहर काका की गाँव में किसी से इतनी गहरी दोस्ती नहीं हुई थी। लेखक कहता है कि हरिहर काका उससे कभी भी कुछ नहीं छुपाते थे, वे उससे सबकुछ खुल कर कह देते थे लेकिन अभी इस समय उन्होंने लेखक से भी बात करना बंद कर दिया था। उनकी इस तरह की परिस्थिति को देख कर लेखक को उनकी चिंता हो रही थी। उनकी स्थिति लेखक को इस तरह लग रही थी जैसे कोई नाव जल प्रवाह या भवसागर के मध्य में फँस गई हो और उसमे बैठे लोग किसी को चिल्लाकर भी नहीं बुला सकते क्योंकि भवसागर के बीच में होने की वजह से उनकी आवाजें कहीं लहरों की आवाजों में मिल कर लुप्त हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में चुप-चाप वहीँ पानी में ही अंतिम साँस लेने के आलावा कोई और रास्ता नहीं रह जाता। लेखक कहता है कि उसे हरिहर काका की ऐसी स्थिति पर विश्वास नहीं हो रहा था। ऐसी स्थिति में जैसे जीने के लालच में बैचेनी और छटपटाहट बढ़ जाती है, कुछ ऐसी ही स्थिति के बीच में हरिहर काका