राम और रावण के बीच हुए युद्ध का वर्णन कीजिए
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राम और रावण का युद्ध
वह वानर-यूथपतियों से युद्ध करता हुआ श्रीरामचन्द्र जी की ओर दौड़ा। उसे क्रोधपूर्वक आक्रमण करते देख मैन्द, नील, नल, अंगद, हनुमान और जाम्बवान ने सेना सहित आगे बढ़कर उसे चारों ओर से घेर लिया। उन रीछ और वानर सेनापतियों ने दयानन के देखते-देखते वृक्षों की मार से उसकी सेना का संहार आरम्भ कर दिया। अपनी सेना को शत्रुओं द्वारा मारी जाती देख मायावी राक्षसराज रावण ने माया प्रकट की। उसके शरीर से सैंकड़ों और हजारों राक्षस प्रकट होकर हाथों में बाण, शक्ति तथा ऋष्टि आदि आयुध लिये दिखायी देने लगे। श्रीरामचन्द्र जी ने अपने दिव्य अस्त्र के द्वारा उन सब राक्षसों को नष्ट कर दिया। तब राक्षसराज ने पुनः माया की सृष्टि की। भारत! दशानन ने श्रीराम और लक्ष्मण के ही बहुत से रूप धारण करके श्रीराम और लक्ष्मण पर धावा किया। तदनन्तर वे राक्षस हाथों में धनुष बाण लिये श्रीराम और लक्ष्मण को पीड़ा देते हुए उन पर टूट पड़े। राक्षसराज रावण की उस माया को देखकर इक्ष्वाकुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण को तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उन्होंने श्रीराम से यह महत्त्वपूर्ण बात कही- ‘भगवन! अपने ही समान आकार वाले इन पापी राक्षसों को मार डालिये।’ तब श्रीराम ने रावण की माया से निर्मित अपने की समान रूप धारण करने वाले उन सबको तथा अनय राक्षसों को भी मार डाला।
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राम और रावण का युद्ध
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वह वानर-यूथपतियों से युद्ध करता हुआ श्रीरामचन्द्र जी की ओर दौड़ा। उसे क्रोधपूर्वक आक्रमण करते देख मैन्द, नील, नल, अंगद, हनुमान और जाम्बवान ने सेना सहित आगे बढ़कर उसे चारों ओर से घेर लिया। उन रीछ और वानर सेनापतियों ने दयानन के देखते-देखते वृक्षों की मार से उसकी सेना का संहार आरम्भ कर दिया। अपनी सेना को शत्रुओं द्वारा मारी जाती देख मायावी राक्षसराज रावण ने माया प्रकट की। उसके शरीर से सैंकड़ों और हजारों राक्षस प्रकट होकर हाथों में बाण, शक्ति तथा ऋष्टि आदि आयुध लिये दिखायी देने लगे। श्रीरामचन्द्र जी ने अपने दिव्य अस्त्र के द्वारा उन सब राक्षसों को नष्ट कर दिया। तब राक्षसराज ने पुनः माया की सृष्टि की। भारत! दशानन ने श्रीराम और लक्ष्मण के ही बहुत से रूप धारण करके श्रीराम और लक्ष्मण पर धावा किया। तदनन्तर वे राक्षस हाथों में धनुष बाण लिये श्रीराम और लक्ष्मण को पीड़ा देते हुए उन पर टूट पड़े। राक्षसराज रावण की उस माया को देखकर इक्ष्वाकुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण को तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उन्होंने श्रीराम से यह महत्त्वपूर्ण बात कही- ‘भगवन! अपने ही समान आकार वाले इन पापी राक्षसों को मार डालिये।’ तब श्रीराम ने रावण की माया से निर्मित अपने की समान रूप धारण करने वाले उन सबको तथा अनय राक्षसों को भी मार डाला।
मातलि का रणभूमि में प्रस्थान
इसी समय इन्द्र का सारथि मातलि हरे रंग के घोड़ों से जुते हुए सूर्य के समान तेजस्वी रथ के साथ उस रणभूमि में श्रीरामचन्द्र जी के समीप आ पहुँचा।
मातलि द्वारा इंद्र का संदेश देना
मातलि बोला- पुरुषसिंह! यह हरे रंग के घोड़ों से जुता हुआ विजयशाली उत्तम रथ देवराज इन्द्र का है। इस विशाल रथ के द्वारा इन्द्र ने सैंकड़ों दैत्यों और दानवों का समरांगण में संहार किया है। नरश्रेष्ठ! मेरे द्वारा संचालित इस रथ पर बैठकर आप युद्ध में रावण को शीघ्र मार डालिये, विलम्ब न कीजिये। मातलि के ऐसा कहने पर श्रीरामचन्द्र जी ने उसकी बात पर इसलिये संदेह किया कि कहीं यह भी राक्षस की माया ही न हो। तब विभीषण ने उनसे कहा- ‘पुरुषसिंह! यह दुरात्मा रावण की माया नहीं है। ‘महाद्युते! आप शीघ्र इन्द्र के इस रथ पर आरूढ़ होइये।’ तब श्रीरामचन्द्र जी ने प्रसन्नतापूर्वक विभीषण से कहा- ‘ठीक है।’
राम द्वारा रावण पर आक्रमण
यों कहकर उन्होंने रथ पर आरूढ़ हो बड़े रोष के साथ दशमुख रावण पर आक्रमण किया। रावण पर श्रीराम की चढ़ाई होते ही समस्त प्राणी हाहाकार कर उठे, देवलोक में नगारे बज उठे और जोर-जोर से सिंहनाद होने लगा। दशकन्धर रावण तथा राजकुमार श्रीराम में उस समय महान युद्ध छिड़ गया। उस युद्ध की संसार में अन्यत्र कही उपमा नहीं थी। उनका वह संग्राम उन्हीं के संग्राम के समान था। निशाचर रावण ने श्रीराम पर एक त्रिशूल चलाया, जो उठे हुए इन्द्र के वज्र तथा ब्रह्मदण्ड के समान अत्यन्त भयंकर था; परंतु श्रीराम ने ततकाल अवपने तीखे बाणों द्वारा उस त्रिशूल के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। उनका यह दुष्कर कर्म देखकर दशानन रावण के मन में भय समा गया। फिर कुपित होकर उसने तुरंत ही तीखे सायकों की वर्षा आरम्भ की। उस समय श्रीरामचन्द्र जी के ऊपर भाँति-भाँति के हजारों शस्त्र गिरने लगे तथा भुशुण्डी, शूल, मुसल, फरसे, नाना प्रकार की शक्तियाँ, शतघ्नी और तीखी धारवाले बाणों की वृष्टि होने लगी। राक्षस दशानन की उस विकराल माया को देखकर सब वानर भय के मारे चारों दिशाओं में भाग चले। तब श्रीरामचन्द्र जी ने सोने के सुन्दर पंख तथा उत्तम अग्रभाग वाले एक श्रेष्ठ बाण को तरकस से निकालकर उसे ब्रह्मास्त्र द्वारा अभितन्त्रित किया।
रावण का वध
श्रीराम द्वारा ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित किये हुए उस उत्तम बाण को देखकर इन्द्र आदि देवता तथा गन्धर्वों के हर्ष की सीमा न रही। शत्रु के प्रति श्रीराम के मुख से ब्रह्मास्त्र का प्रयोग होता देख देवता, दावन और किन्नर यह समझ गये कि अब इस राक्षस की आयु बहुत थोड़ी रह गयी है। तदनन्तर श्रीरामचन्द्र जी ने उठे हुए ब्रह्मदण्ड के समान भयंकर तथा अप्रतिम तेजस्वी उस रावण विनाशक बाण को छोड़ दिया। युधिष्ठिर! श्रीराम द्वारा धनुष को दूर तक खींचकर छोड़े हुए उस बाण के लगते ही राक्षसराज रावण रथ, घोड़े और सारथि सहित इस प्रकार जलने लगा मानो भयंकर लपटों वाली आग के लपेट में आ गया हो। इस प्रकार अनायास ही महान कर्म करने वाले श्रीरामचन्द्र जी के हाथों से रावण को मारा गया देख देवता, गन्धर्व तथा चारण बहुत प्रसन्न हुए। तदनन्तर पाँचों भूतों ने उस महान भाग्यशाली रावण को त्याग दिया। ब्रह्मास्त्र के तेज से दग्ध होकर वह सम्पूर्ण लोकों से भ्रष्ट हो गया। उसके शरीर के धातु, मांस तथा रक्त भी ब्रह्मास्त्र से दग्ध होकर नष्ट हो गये। उसकी राख तक नहीं दिखाई दी।