Hindi, asked by dkrao, 1 year ago

सूरदास के भाषा लिपी ​

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Answered by svirdi933
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सूर की भाषा ब्रजभाषा है इसमें दो मत नहीं है। पर सूर के काव्य को पढ़कर कुछ प्रश्न उठते हैं। यथा-

1. क्या सूर से पूर्व भी ब्रजभाषा का असितत्व था? आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने यह संकेत दिया था कि सूर की भाषा किसी दीर्घ परम्परा में पली और लोकप्रचलित भाषा का परिणाम होनी चाहिये। आचार्य शुक्ल के शब्द हैं-'इन पदों के सम्बन्ध में सबसे पहली बात ध्यान देने की यह है कि चलती हुर्इ ब्रजभाषा में सबसे पहली साहितियक रचना होने पर भी ये इतने सुडौल और परिमार्जित हैं। यह रचना इतनी प्रगल्भ और काव्यांग-पूर्ण है कि आगे होने वाले कवियों की उकितयाँ सूर की जूठी-सी जान पड़ती हेैं। अत: सूरसागर किसी चली आती दुर्इ गीत-काव्य-परम्परा का-चाहे वह मौखिक ही रही हो-पूर्ण विकास-सा प्रतीत होता है।

2. क्या सूर से पूर्व की ब्रजभाषा को सिद्ध करने के लिए साहित्य भी मिलता है?

3. सूर की ब्रजभाषा उस भाषा के विकास की किस अवस्था की है?

नयी खोजों से यह प्रकट होता है कि ब्रजभाषा की खोज सातवीं-आठवीं शताब्दी तक तो मिल ही जाती है और वहाँ से चलकर ब्रजभाषा 'सूर तक पहुँची तो बहुत-से साहित्य से वह समृद्ध हो चुकी थी। हमने 'ब्रज साहित्य का इतिहास नामक पुस्तक (डा सत्येंद्र) के आधार पर संक्षेप में कहा जा सकता है कि-'ब्रजभाषा का आरम्भ अन्य देशी भाषाओं के साथ दसवीं शती के बीच हुआ था। सिद्धों से हम आरम्भ कर सकते हैं। प्रथम सिद्ध सरहपा का समय (760 र्इ.) 817 सं. है। इनकी भाषा में ब्रजभाषा की प्रवृत्ति की झलक की प्रथमावस्था दिखार्इ पड़ती है। सरहपा ने 'दोहा कोष लिखा। दोहे पशिचम की वस्तु हैं, वह भी हिन्दी की, इसमें संदेह नहीं सरहपा ने 'चौपार्इ-दोहा छन्द में भी लिखा था। सरहपा का यह 'चौपार्इ-बंध ब्रजभाषा में भी संभवत: निरंतर चलता रहा। 990 संवत के लगभग देवसेन ने 'सावदधम्म दोहा लिखा। पशिचमी शौरसेनी किस प्रकार सरहपा से आगे बढ़ी इसका उदाहरण देवसेन के दोहों में मिलता है।

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