saprasang vyakhya kijiye
उधौ मन मोहन न आबें, निठुर भए सरसावें
हम म्वाँ जोग, भोग कुब्जा खाँ, जा नई राय चलालें
जबसे गए खबर न भेजी, नहीं संदेस पठावें
आपुन जाय द्वारका छाए, कुब्जा कंठ न लगावे॥
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