जन-२. स्वाविद्यालस्य वार्षिकोत्सवंवर्णयन्त; मिनं प्रतिलिखिते
अस्मिन् पत्रे उचितपदैः रिक्तस्थानानि पूरयत.
(अंक-5)
प्रिय
सप्रेम नमः
भवत: पत्रं
पत्रं_i_अहं स्वविद्यालस्य
in__वर्णयामि।
एकमासपूर्वमेव _सर्वे: अहयापका: _v_चकायेषु
व्यस्ता: आस्सन । शिक्षानिदेशक कार्यक्रमस्य_7 आसीत्।
स:
--अतीव प्राशप्सत् ।
हात्रेभ्य:च_-
अयच्छत् । पितृभ्याम् नमः।
iv
भवतः-
'मंजूषा'
योग्येभ्यः,राकेश, वार्षिकोत्सव हात्रा: प्राप्तम,कार्यक्रमम्,
पारितोषिकानि, मित्रम् मुख्यातिथि:, विद्यालयस्य ।
खण्ड-ग
प्रश्न-369)सन्धिं कुरुत
अंक-5+5=10
(क) शिव+आलयः (आ) इति+ उक्त्वा (ग) प्र+उक्तम्
(घ) यथा+इच्छम (ड.) च+एकाकिनी
(C) प्रकृति-प्रत्यय संयोगं विधागंचकुलर-
(क) दृश+कत्वा (8) नि+क्षिप् + ल्यप (ज) सुता () विलोक्य
Answers
Explanation:
सर्वेश्वरवाद (Pantheism) कारण और कार्य को अभिन्न मानता है। इसकी प्रमुख प्रतिज्ञा यह है कि ब्रह्म और ब्रह्मांड एक ही वस्तु है। नवीन काल में स्पीनोजा इस सिद्धांत का सबसे बड़ा समर्थक समझा जाता है। उसके विचारानुसार यथार्थ सत्ता एकमात्र द्रव्य, ईश्वर, की है, सारे चेतन उसके चिंतन के आकार हैं, सारे आकृतिक पदार्थ उसके विस्तार के आकार हैं।
सर्वेश्वरवाद वैज्ञानिक और धार्मिक मनोवृत्तियों के लिए विशेष आकर्षण रखता है। विज्ञान के लिए किसी घटना को समझने का अर्थ यही है उसे अन्य घटनाओं से संबद्ध किया जाए, अनुवेषण का लक्ष्य बहुत्व में एकत्व को देखना है। सर्वेश्वरवाद इस प्रवृत्ति को इसके चरम बिंदु तक ले जाता है और कहता है कि बहुत्व की वास्तविक सत्ता है ही नहीं, यह आभासमात्र है। धार्मिक मनोवृत्ति में भक्तिभाव केंद्रीय अंश है। भक्त का अंतिम लक्ष्य अपने आपकोश् उपास्य में खो देना है। अति निकट संपर्क और एकरूपता में बहुत अंतर नहीं। भक्त समझने लगता है कि उसका काम इस भ्रम से छूटना है कि उपास्य और उपासक एक दूसरे से भिन्न हैं।
मनोवैज्ञानिक और नैतिक मनोवृत्तियों के लिए इस सिद्धांत में अजेय कठिनाइयाँ हैं। हम बाहरी जगत् को वास्तविक कर्मक्षेत्र के रूप में देखते हैं, इसे छायामात्र नहीं समझ सकते। नैतिक भाव समस्या को और भी जटिल बना देता है। यदि मनुष्य स्वाधीन सत्ता ही नहीं तो उत्तरदायित्व का भाव भ्रम मात्र है। जीवन में पाप, दु:ख और अनेक त्रुटियाँ मौजूद हैं सर्वेश्वरवाद के पास इसका कोई समाधान नहीं।