नागपुर योजना क्या है
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सड़क परिवहन के विकास को समझने के लिए हमें वर्ष 1908 के इंपीरियल गजेटियर को पढऩा होगा। इसमें लिखा गया है, 'सही मार्ग को बनाए रखना और आम चलन वाले रास्तों पर लोगों के जान माल की रक्षा को कभी भी नजरअंदाज नहीं किया गया। मुगल बादशाहों ने खासतौर पर देश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर वस्तुओं के साथा आवागमन करने वाले व्यापारियों के काफिलों की निगरानी के लिए रास्तों पर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की...आमतौर पर इन रास्तों की निगरानी थोड़ी-थोड़ी दूरी पर चौकियों की स्थापना करके की जाती थी। चौकियों के बीच के रास्तों को पत्थरों, खंभों या वृक्षों से चिह्नित किया जाता था। रास्ते जिन जमींदारों की जमीन से होकर गुजरते थे उन्हें चौकीदार दिए गए थे और उनको वहां से गुजरने वालों से मामूली टोल वसूलने की इजाजत थी। अमलगुजार या मजिस्ट्रेट अपने-अपने क्षेत्र में चोरी होने वाली सभी वस्तुओं के लिए जिम्मेदार होते थे। ऐसे में कहा जा सकता है कि सुरक्षा की स्थिति चाक-चौबंद रहती थी। 18वीं सदी के अंतिम दिनों की बात है, बनारस के रेजिडेंट जॉनथन डंकन ने बनारस की ओर आने वाली सड़कों पर चौकी शुल्क समाप्त कर दिया। पहले तो कारोबारियों ने यह कहकर इसका विरोध किया कि वे लूटे जाने का जोखिम उठाने के बादले शुल्क चुकाना पसंद करेंगे।' जमींदारों की जिम्मेदारी रक्षा एवं सुरक्षा से कहीं अधिक थी, 'बंगाल प्रेसिडेंसी में स्थानीय सड़कों को खोलने और उनके रखरखाव का काम जमींदारों के जिम्मे डाल दिया गया और सन 1822 के नियम 7 और 1833 के नियम 9 के अधीन सभी अस्थायी रूप से निर्मित परिसंपत्तियों पर 1 फीसदी का उपकर लगाया गया। ऐसा सड़क फंड बनाने के लिए किया गया ताकि जरूरी खर्च निपटाए जा सकें। स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के बाद इस फंड से निकलने वाला कोई भी अधिशेष मुख्य मार्गों में सुधार कार्य के लिए काम में लाया जाता।' ऐसे में कहा जा सकता है कि सड़क उपकर का विचार नया नहीं है।
सड़क विकास की जिम्मेदारी अपने आप में कई तरह की परतें समेटे रहती है। 'बंगाल बोर्ड ऑफ गवर्नर जनरल द्वारा 1841 से 1849 के बीच बनाई गई रिपोर्ट से साफ पता चलता है कि कैसे उन दिनों प्रांत और प्रमुख मार्गों का रखरखाव अराजकता का शिकार था। प्रांतीय सरकार अपने अधिकारियों के माध्यम से वास्तविक काम को अंजाम दे रही थी और धन की आपूर्ति की जा रही थी। कई बार यह आपूर्ति सर्वोच्च सरकार द्वारा सीधे तौर पर की जाती और कई बार स्थानीय सरकार द्वारा। कई दफा यह काम सरकार और जमींदार तथा कारोबारी आंशिक तौर पर करते। कई बार यह काम राजाओं और अन्य बड़े लोगों द्वारा दिए गए दान के माध्यम से भी किया जाता था। ये वे लोग होते थे जिनके क्षेत्र से ये सड़कें गुजरती थीं।' जब भी सरकार की ओर से जिम्मेदारी में बदलाव आता, एक किस्म का विकेंद्रीकरण होता।
'सड़क निर्माण चालू रखने और उनके रखरखाव से जुड़ा एक अन्य बड़ा कारक स्थानीय स्वशासन का विस्तार है...जो नगरपालिकाएं अपने सीमा क्षेत्र में सड़कों के रखरखाव के लिए जिम्मेदार थीं उनकी संख्या सन 1860 और 1870 के बीच बहुत तेजी से बढ़ी। सन 1870-71 में लार्ड मेयो के कार्यकाल में स्थानीय नीतियों और मामलों के नियंत्रण को लेकर उनके अधिकारों में भी काफी इजाफा किया गया। सन 1881-84 में लॉर्ड रिपन के कार्यकाल में इनमें और इजाफा हुआ।' इन उपायों के परिणामस्वरूप ब्रिटिश इंडिया के अधिकांश प्रंातों में अब जिला और उप जिला स्तरीय बोर्ड हैं जिनका प्राथमिक काम है भूमि उपकर तथा आय के अन्य स्थानीय स्रोतों से मिलने वाली आय से बने कोष का इस्तेमाल स्थानीय संचार माध्यमों के रखरखाव और सुधार कार्यों पर करना। इसी प्रकार जिस तरह पुराने सैन्य बोर्डों का स्थान लोक निर्माण विभाग ने ले लिया, लॉर्ड मेयो और लॉर्ड लिटन1 ने भारत सरकार को सक्षम बनाया कि वह सड़क निर्माण की अपनी अधिकांश जवाबदेही स्थानीय सरकारों को सौंप सके।