Hindi, asked by anshsingh53, 2 months ago

रस्सी कच्चे धागे की खींच रही मैं ना जाने कब सुन ले मेरी पुकार करे थे भवसागर पार पानी टपके पिक्चर सकोरे व्यर्थ प्रयास हो रहे हैं मेरे जी में उत्तीर्ण कर हूं घर जाने की इच्छा है गहरे काव्य सौंदर्य लिखिए?​

Answers

Answered by mishrarishiraj219
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Answer:

रस्सी कच्चे धागे की खींच रही मैं नाव

जाने कब सुन मेरी पुकार,करें देव भवसागर पार,

पानी टपके कच्चे सकोरे ,व्यर्थ प्रयास हो रहे मेरे,

जी में उठती रह-रह हूक,घर जाने की चाह है घेरे।

व्याख्या :- प्रस्तुत वाख में कवयित्री ललद्यद ने कहा है कि प्रभु-मिलन की आस में मैं अपने जीवन रूपी नाव को साँसों की डोरी (कच्ची रस्सी) के सहारे आगे बढ़ा रही हूँ। प्रभु न जाने कब मेरी पुकार सुनेंगे और मुझे इस भवसागर से पार करेंगे। मिट्टी से बने इस शरीर रूपी कच्चे सकोरे से निरंतर पानी टपक रहा है अर्थात् एक-एक दिन करके उम्र घटते जा रही है। प्रभु-मिलन के लिए किये गए अब तक के सारे प्रयास व्यर्थ हो चुके हैं। मेरी आत्मा परमात्मा से मिलने को व्याकुल हो रही है। बार - बार असफलता के कारण मेरे मन में ग्लानि हो है।

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