१) प्राण से जस्ती प्यारा कोई नहीं है ।
२) राष्ट्र का वास्ते हम सब कुछ करेंगे । शुद्ध करके लिखो
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हमने हिन्दू शास्त्र, योग और आयुर्वेद की किताबों में पढ़ा है कि 100 वर्ष तो जीना बहुत आसान है लेकिन 150 वर्ष स्वस्थ रहकर जिंदगी गुजारना कठिन है और उससे भी कठिन है 500 वर्षों तक जिंदा रहना। हालांकि यह संभव हो सकता है। कैसे? आओ जानते हैं इसी बारे में संक्षिप्त जानकारी।
नोट- महत्वपूर्ण जानकारी से पहले जानना जरूरी है बेसिक ज्ञान ताकि आपको यह पता चले कि हमारे शरीर में डॉक्टर की भूमिका और कार्य क्या है।
बेसिक ज्ञान- आपको खाना खाना पड़ता है, पानी पीना पड़ता है लेकिन हवा को न तो खाना पड़ता है और ना ही पीना पड़ता है। इस हवा के बगैर आप एक पल भी जिंदा नहीं रह सकते हैं। इस हवा को योग और आयुर्वेद में 'प्राण शक्ति' कहते हैं। आपने सुना भी होगा की प्राण निकल जाने से व्यक्ति मर जाता है।
हम शुद्ध खाना चाहते हैं, शुद्ध पानी पीना चाहते हैं लेकिन बहुत कम लोग सोचते हैं कि हमें शुद्ध वायु मिले। यदि शुद्ध वायु नहीं मिल रही है तो शुद्ध भोजन और पानी का कोई खास असर नहीं होगा। बस आप जिंदा रहेंगे। लेकिन सबसे जरूरी शुद्ध वायु को ग्रहण करना। क्योंकि वायु ही हमारे जिंदगी को चलाती है।
शरीर के भीतर है 28 प्रकार की वायु- वैदिक ऋषि विज्ञान के अनुसार कुल 28 तरह के प्राण होते हैं। कंठ से गुदा तक शरीर के तीन हिस्से हैं। उक्त तीन हिस्सों में निम्नानुसार 7,7 प्राण हैं। ये तीन हिस्से हैं- कंठ से हृदय तक, हृदय से नाभि तक और नाभि से गुदा तक। पृथिवि लोक को बस्ती गुहा, वायुलोक को उदरगुहा व सूर्यलोक को उरोगुहा कहा है। इन तीनों लोको (हिस्सों) में हुए 21 प्राण है।
पांव के पंजे से गुदा तक तथा कंठ तक शरीर प्रज्ञान आत्मा ही है, किंतु इस आत्मा को संचालन करने वाला एक और है- वह है विज्ञान आत्मा। इसको परमेष्ठी मंडल कहते हैं। कंठ से ऊपर विज्ञान आत्मा में भी 7 प्राण हैँ- नेत्र, कान, नाक छिद्र 2, 2, 2 तथा वाक (मुंह)। यह 7 प्राण विज्ञान आत्मा परमेष्ठी में हैं।
अब परमेष्ठी से ऊपर मुख्य है स्वयंभू मंडल जिसमें चेतना रहती है यही चेतना, शरीर का संचालन कर रही है अग्नि और वायु सदैव सक्रिय रहते हैं। आप सो रहे है कितु शरीर में अग्नि और वायु (श्वांस) निरंतर सक्रिय रहते हैं। चेतना, विज्ञान आत्मा ही शरीर आत्मा का संचालन करती है। परमेष्ठी में ठोस, जल और वायु है। यही तीनों, पवमान सोम और वायव्यात्मक जल हैं। इन्हीं को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन कहते हैं जल और वायु की अवस्था 3 प्रकार की है अत:जीव भी तीन प्रकार अस्मिता, वायव्य और जलज होते हैं। चेतना को भी लोक कहा है। इसे ही ब्रह्मलोक, शिवलोक या स्वयंभूलोक कहते हैं। ब्रह्मांड भी ऐसा ही है।
योग के अनुसार प्राण के प्रकार- हम जब श्वास लेते हैं तो भीतर जा रही हवा या वायु मुख्यत: पांच भागों में विभक्त हो जाती है या कहें कि वह शरीर के भीतर पांच जगह स्थिर और स्थित हो जाता हैं। लेकिन वह स्थिर और स्थित रहकर भी गतिशिल रहती है। ये पंचक निम्न हैं- 1. व्यान, 2. समान, 3. अपान, 4. उदान और 5. प्राण।
वायु के इस पांच तरह से रूप बदलने के कारण ही व्यक्ति की चेतना में जागरण रहता है, स्मृतियां सुरक्षित रहती है, पाचन क्रिया सही चलती रहती है और हृदय में रक्त प्रवाह होता रहता है। इनके कारण ही मन के विचार बदलते रहते या स्थिर रहते हैं। उक्त में से एक भी जगह दिक्कत है तो सभी जगहें उससे प्रभावित होती है और इसी से शरीर, मन तथा चेतना भी रोग और शोक से घिर जाते हैं। मन-मस्तिष्क, चरबी-मांस, आंत, गुर्दे, मस्तिष्क, श्वास नलिका, स्नायुतंत्र और खून आदि सभी प्राणायाम से शुद्ध और पुष्ट रहते हैं। इसके काबू में रहने से मन और शरीर काबू में रहता है।
1.व्यान- व्यान का अर्थ जो चरबी तथा मांस का कार्य करती है।
2.समान- समान नामक संतुलन बनाए रखने वाली वायु का कार्य हड्डी में होता है। हड्डियों से ही संतुलन बनता भी है।
3.अपान- अपान का अर्थ नीचे जाने वाली वायु। यह शरीर के रस में होती है।
4.उदान- उदान का अर्थ उपर ले जाने वाली वायु। यह हमारे स्नायुतंत्र में होती है।
5.प्राण- प्राण वायु हमारे शरीर का हालचाल बताती है। यह वायु मूलत: खून में होती है।
कौन है डॉक्टर और कैसे करता है यह इलाज?
आशा है कि उपरोक्त जो लिखा है वह आपने पढ़ ही लिया होगा। तो अब आप समझ ही गए होंगे कि हमारे शरीर का डॉक्टर है हमारी प्राण शक्ति। यह प्राण शक्ति एक वक्त में एक ही कार्य करती है। पहला कार्य है शरीर का भोजन पचाना और उसके रस को महत्वपूर्ण अंगों तक पहुंचाना और दूसरा कार्य है आपके शरीर से गंदगी को बाहर निकालना और यदि कोई बीमारी है तो उसका इलाज करना।
जानने वाली बात यह है कि यह प्राण शक्ति एक वक्त में एक ही कार्य करती है। यदि आप दो से तीन समय खाते हैं तो प्राण शक्ति का संपूर्ण समय आपके भोजन को पचाने और उसके रस को दूसरे अंगों को पहुंचेने में ही लगेगा। मतलब यह कि वह 24 घंटे एक ही कार्य करेगी। उल्लेखनीय है कि फल को पचने में 3 घंटे, सब्जी को पचने में 6 घंटे और अनाज को पचने में 18 घंटे लगते हैं। अब आप सोचिए कि फिर प्राण शक्ति शरीर का इलाज कब करेगी?
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